
‘भयमुक्त बुग्याल’ अपने शीर्षक और आवरण से ही सम्मोहित करना शुरू कर देती है। हरेक कहानी सामाजिक सरोकारों का ही प्रतिबिम्ब लगती हैं, जैसे हम अपनी ही आंखो से सब होता देख रहे हैं, वही रूढ़ियाँ, वही मानसिक कमज़ोरियाँ, वही राजनीति, वही सामाजिक विघटन! सब कुछ वही जिसे हम महसूस करते आ रहे हैं, लेकिन ये कहानियाँ हमारी उन सुप्त संवेदनाओं को जगा देती हैं।
किताब का शीर्षक जिस कहानी से लिया गया है, ‘भयमुक्त बुग्याल’, भेड़-बकरी-मेढ़-लंगोठों के रूप में हम लोगों की ही कहानी है। आज के दौर में भी हम इंसानों के बीच कुछ ऐसे ही भेड़िए हैं, जो आन्दोलनों को बिखरने, उनमें फूट डालने का काम तेजी से करने लगे हैं। इन आन्दोलनों में भी भयमुक्त बुग्याल की उसी कल्पना का अक्स दिखता है। जाॅर्ज औरवैल ने भी शायद ऐसी ही कुछ कल्पना की होगी एनिमल फार्म जैसे कालजयी सृजन के समय!
उत्तराखण्ड आन्दोलन उसके परिणाम और अन्ततः हाथ लगी हताशा का सटीक चित्र खींचती है कहानी, ‘रतन सिंह को बालिग होने की बधाईयाँ’।
एक कहानी है, ‘साझा मकान’। इस कहानी में बैंडोली गाँव का सन्दर्भ पढ़कर कहानी से अजीब सी आत्मीयता हो गयी। बैंडोली के बाद आता है मलेटी गाँव, मेरा पैतृक गाँव है। मैं जानती हूँ कि एक दौर में बैंडोली, दुब्तोल़ी गाँव के कारीगरों की पूरे गढ़वाल में तूती बोलती थी, वहाँ के कारीगर बड़े प्रसिद्ध होते थे, जो महीनों-महीनों दूसरे गाँवों में म्वौरी-ख्वल़ी पर नक्काशियों के लिए गए होते थे। लेकिन अब ये पुश्तैनी काम नहीं रहा। सुना है, अब तो रोंट बनाने का सांचा ढालनेे वाला भी नहीं रहा वहाँ कोई!
समय साक्ष्य, देहरादून से वर्ष 2018 में प्रकाशित, ऐसी ही बेहतरीन कुल दस कहानियों का संकलन है, ‘भयमुक्त बुग्याल तथा अन्य कहानियाँ’। हो सके तो, पढ़िएगा।
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