सोमवार, 13 फ़रवरी 2012

रत्नों की खान का ग़ुम हो जाना..............

अक्सर ऐसा क्यूँ होता है की इंसान के चले जाने के बाद ही उसके बारे में ज्यादा जानने को मिलता है, ..............(मीडिया भी तभी सक्रिय होता है.)
 विद्या सागर नौटियाल जी के बारे में काफी कुछ सुना था, उनकी कृतियाँ-उनके साहित्य की प्रशंसा, उनका राजनैतिक योगदान, उनकी वामपंथी विचारधारा के बारे में गाहे-ब-गाहे  पढने-सुनने को मिलता रहता था, ऐसे मौकों पर उन्हें साक्षात देखने की प्रबल इच्छा होती, पर समय ने कहाँ  किसी की राह देखी  है, अब ये कभी संभव न हो सकेगा!
कल अचानक उनके चले जाने की खबर से झटका लगा, लगा की उत्तराखंड का एक और हीरा सदा के लिए खो गया मगर आज जब अखबारों में ब्लोगों में उनके बारे में इतना कुछ पढ़ा तो मालूम हुआ की एक हीरा नहीं रत्नों की खान ही खो गयी है, ऐसा ही दुःख गिर्दा के जाने पर भी महसूस हुआ था..................!! 


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