माँ जब भी मुझे बुलाती है .................
बस सबसे छुपके, चुपके से
अंखियों से नीर बहाती हूँ
लाचार नहीं मैं फिर भी यूँ
बेचारी हो रह जाती हूँ
दिल को कितना ही कड़ा करूँ
ये मन ही मन घुलता रहता
हो मोम का जैसे बुत कोई
जलता रहता- गलता रहता
सब भूल भी जाऊं मैं लेकिन
माँ का अर्पण कैसे भूलूं
माँ के आगे- पीछे बीते
उस बचपन को कैसे भूलूं
अब बात नहीं मेरे बस में
मै टुकड़े- टुकड़े टूट चुकी
तेरी ममता के हिस्से के
टुकड़े को मैं खुद लूट चुकी
खुशियों की बस्ती में रहकर
बस यादों से घबराती हूँ
कितने द्वंदों- प्रतिद्वंदों की
लपटों में मैं घिर जाती हूँ
माँ जब भी मुझे बुलाती है .................
बस सबसे छुपके, चुपके से
अंखियों से नीर बहाती हूँ
लाचार नहीं मैं फिर भी यूँ
बेचारी हो रह जाती हूँ
दिल को कितना ही कड़ा करूँ
हो मोम का जैसे बुत कोई
जलता रहता- गलता रहता
सब भूल भी जाऊं मैं लेकिन
माँ का अर्पण कैसे भूलूं
माँ के आगे- पीछे बीते
उस बचपन को कैसे भूलूं
अब बात नहीं मेरे बस में
मै टुकड़े- टुकड़े टूट चुकी
तेरी ममता के हिस्से के
टुकड़े को मैं खुद लूट चुकी
खुशियों की बस्ती में रहकर
बस यादों से घबराती हूँ
कितने द्वंदों- प्रतिद्वंदों की
लपटों में मैं घिर जाती हूँ
माँ जब भी मुझे बुलाती है .................