सोमवार, 5 अप्रैल 2021

 

“....प्लेग किसी का लिहाज या इज्जत नहीं करती थी और उसके निरंकुश शासन में गर्वनर से लेकर मामूली अपराधी भी एक-सी सजा भुगत रहा था और जेल के इतिहास में शायद पहली बार निष्पक्ष रूप से इन्साफ हो रहा था।

प्लेग भेद-भावों को समतल कर रही थी, इसे दूर करने के लिए अधिकारियों ने छोटे-बड़े का वर्गीकरण किया... ”

प्लेगः अल्वेयर कामू

अनुवादकः अनुराधा श्रीवास्तव

प्रकाशन सर्वोदय साहित्य संस्थान, दिल्ली

कोरोना का ये दौर, जैसे इस किताब में दिए कथ्यों की पुनरावृत्ति है! आज शायद इसलिए भी इस किताब की प्रासंगिकता पाठकों के लिए बढ़ जाती है। 1947 में मूल रूप से French में लिखी गयी ‘ला पेस्ट’ का यह हिन्दी अनुवाद हम हिन्दी के पाठकों के लिए किसी अनुग्रह से कम नहीं है।  

कोरोना के इस दौर में हमने कोरोना मरीज़ों के साथ ही न जाने कितने डाॅक्टरों, नर्सों और सेवा में लगे लोगों - तीमारदारों को पूरी ईमानदारी से जुटते हुए देखा, उनमें से कितनों ही को जान गंवाते देखा। कोरोना और ज़िन्दगी के इस महायुद्ध में ज़िन्दगी के पक्ष में न जाने कितने ही वाॅलण्टियर्स ने खुद को समर्पित किया। इस दौर में सरकारी फरमानों की बाढ़ आई तो कहीं नाफरमानी हुई। लाॅक डाउन में सड़कों पर पैदल चलने वालों की मजबूरियों को देखकर दिल ज़ार-ज़ार भी हुआ। 

इन सब मानवीय संवेदनाओं को ‘प्लेग’ में जिस तरह से लिखा गया है, उसे ठीक वैसे ही इस दौर में हमने जीकर महसूस किया है। परिस्थितियों के प्रति मनुष्य का व्यवहार हमेशा लगभग एक जैसा रहा है। किताब में हम पढ़ते हैं कि किस तरह पादरी, फादर पैनेलो चर्च में उमड़ी भीड़ को परिस्थितियों को धार्मिक चश्में से दिखाने की कोशिश करता है, जो बाद में खुद भी प्लेग से मर जाता है, इस बीच के घटनाक्रमों में वह ज़रूरी भूमिका में है, लेकिन धर्म और बीमारी का काॅकटेल यहाँ भी मिलता है, यह दीगर बात है कि धार्मिक द्वेषों को जिस तरह कोरोना के दौर में हमने अपने चरम तक पहुँचते देखा, उस की झलक ‘प्लेग’ में नहीं मिली, शायद लेखक का इस ओर ध्यान ही न गया हो या कि उन्हें ऐसा कोई अनुभव ही न मिला हो या हो सकता है कि, लेखक नकारात्मक परिप्रेक्ष्यों को छोड़ देना चाहते हों! 

कहा जाता है कि, अल्वेयर कामू ने ‘प्लेग’ के लिए बहुत अध्ययन किया था और ओरान शहर को पहले भी महामारियों ने अपना निवाला बनाया था, जिसके निशान भी इस किताब में होंगे, लेकिन हमें ये आज की कहानी लगती है। प्लेग के माध्यम से डाॅक्टर बर्नार्ड रियो के रूप में एक आदर्श चिकित्सक का चरित्र हमारे सामने रखा गया है, जो व्यवस्था को चुनौती देता है, अपनी व्यावसायिक ज़िम्मेदारियों को अपने व्यक्तिगत जीवन की परेशानियों से ऊपर रखते हुए वह पूरी शिद्दत से जूझता है लेकिन कभी निराश नहीं दिखता। किताब में सभी चरित्र अपनी-अपनी विशेषताएं, आकांक्षाएं, लक्ष्य और मनोदशाएं लिए हैं, लेकिन प्लेग से उपजे हालातों ने सभी को मजबूर कर दिया है, जिससे उनके व्यवहार बदलते लगते हैं , ये बदले चरित्र ही पाठक के मन में कौतूहल पैदा करते हैं। इस किताब को पढ़ते हुए, शुरू में ही ओरान शहर का चित्र आंखों में खिंच जाता है और फिर धीरे-धीरे प्लेग से जूझते बदनों पर उभरती गिल्टियों, फैलते बुखार और खून की उल्टियों से सना ओरान का चित्र डराने लगता है। लम्बे संघर्ष के बाद एक बार लगने लगता है कि, प्लेग ख़त्म हो रहा है, चूहे फिर से गलियों में दौड़ने लगे हैं, उम्मीदें हिलौरे मारने लगी हैं, लोग रोशन सड़कों पर चहलकदमी करने लगे हैं, लेकिन ठीक तभी कथानक का एक मजबूत स्तम्भ प्लेग से ढह जाता है, ‘तारो’। प्लेग फिर से नये रूप में सामने आता है।

उधर, लौटते प्लेग की खुशी में शहर झूम रहा है, लेकिन वह यह नहीं जानता कि, प्लेग का कीटाणु मरता नहीं है, वह छिपा रहता है तहखानों में, सन्दूकों में, किताबों में किसी मौके की तलाश में- ऐसा मानना है डाॅ0 बर्नार्ड रियो का! 

इससे ज़्यादा जानना है तो किताब पढ़िए..........प्लेग!

सुनीता मोहन


शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2021

चार्ली चैप्लिनः श्री गीत चतुर्वेदी
संवाद प्रकाशन
‘चार्ली चैप्लिन’! दर्द, अभाव, प्रेम, घृणा, संघर्ष और सफलता के चरमोत्कर्ष को जीते हुए इंसान बने रहने की कहानी!

इस किताब को पढ़ने से पहले मैने शायद ही कभी चार्ली की कोई फिल्म पूरी देखी हो, हाँ उसके बाद जरूर देखीं। बहुत कम लोग होंगे जिनके लिए चार्ली चैप्लिन अनजाना चेहरा होगा। चार्ली का नाम सुनते ही उनका ब्लैक एण्ड व्हाईट पोस्टर मेरी आंखों में उतर आता है। हर दौर मेें प्रासंगिक रहे चार्ली के बारे में मुझे ज्यादा कुछ मालूम नहीं था, सिवाय इसके, कि वो महान एक्टर मूक हास्य फिल्मों का शहंशाह हुआ करता था जो अपनी माँ के बीमार हो जाने के चलते छोटी सी उम्र में ही पहली बार स्टेज पर आकर दर्शकों की तालियां बटोर ले गया और फिर कभी नहीं रूका। लेकिन गीत चतुर्वेदी जी ने अपनी इस किताब में चार्ली और उनके जीवन से जुड़े पहलुओं को इतने करीने से सिलसिलेवार पेश किया है कि, लगता है, हम चार्ली को काफी करीब से जानते हुए, उनके साथ उसी दौर को जी रहे हैं। किताब में, हर अगले कदम वो सारे संघर्ष टूटे काँच के टुकड़ों की तरह बिखरे पड़े मिलते हैं, जिन पर चलकर  चार्ली जख्मी तो हुए लेकिन खुद को टूटने नहीं दिया। किताब में उनकी फिल्मों के जिक्र और उन फिल्मों के बनने-बनाने के किस्से हैं, चार्ली की प्रेमाकांक्षाओं की कहानियाँ हैं।

इतिहास गवाह है कि, सत्ता अक्सर अपने मुखर आलोचक के प्रति अनुदार रही है, चाहे वह सत्ता लोकतन्त्र के जामे में ही क्यों न हो। वह हर उस कलाकार, जो सत्ता की बदनीयती को अपनी कला के माध्यम से सामने लाने की कोशिश करता है, को अपने बनाये कानूनी दांव-पेंचों में उलझा कर कमजोर करती है, वह अपने लोलुप प्रचार तंत्र की मदद से अविवेकी भीड़ का समूह तैयार करती है, जो उसकी पोषित अराजकता का समर्थन करता है। यहूदियों के समर्थन में दिए गये अपने स्टेटमेण्ट्स और द ग्रेट डिक्टेटर की स्पीच जैसी इन्कलाबी गतिविधियों के चलते, अमेरिका में वही दाँव चार्ली पर भी आजमाए गये थे। मीडिया आज भी वही भूमिका निभा रहा है, जो उस दौर में निभा रहा था। किताब से पता चलता है कि, चार्ली की सहानुभूति हर उस आदमी के साथ थी, जो सम्पन्नों का सताया था, यही कारण था कि, वे हिटलर की नीतियों के विरोधी थे और यहूदियों के लिए उनके मन में सहानुभूति थी, मीडिया ने उन्हें कम्यूनिस्ट कहना शुरू कर दिया तो अमेरिका की भीड़ ने उनका बायकाॅट करना! उन्होंने आजीवन अमेरिकी नागरिकता नहीं ली, वो खुद को विश्व नागरिक मानते थे।  

“आपने इस दुनिया को अकूत खुशियाँ और ढेर सारे ठहाके दिये, इसके बावजूद आपको रूखी और कृतघ्न अमेरिकी प्रेस को झेलना पड़ रहा है, एक कलाकार के रूप में आप क्या महसूस करते हैं, चार्ली?” कवि और पत्रकार जिम एजी के इस सवाल के उत्तर में चार्ली की आँखों में आँसू थे और अन्ततः उन्होने अमेरिका को अलविदा कह दिया । उन्होने स्विटज़रलैण्ड को अपना ठौर चुना।

चार्ली चैप्लिन ने सन् 1977, क्रिसमस डे के दिन आखिरी सांस ली, लेकिन सच तो ये है कि, चार्ली चैप्लिन मरा नहीं करते, वो हमेशा रहते हैं और दुनिया को ‘लायक’ बनाये रखने के लिए अपनी कला को साधन बनाते हैं।
शुक्रिया, श्री गीत चतुर्वेदी।
शुक्रिया संवाद प्रकाशन। 




मंगलवार, 22 दिसंबर 2020

भयमुक्त बुग्याल तथा अन्य कहानियाँ : श्री नन्द किशोर हटवाल

 

पिछले दिनों नन्द किशोर हटवाल जी की किताब ‘भयमुक्त बुग्याल तथा अन्य कहानियाँ’ पढ़ी। अपने लेखन की श्रंखला में एक और बेहतरीन रचना को जोड़ने के लिए श्री नन्द किशोर हटवाल जी को हार्दिक बधाई और धन्यवाद हम पाठकों को विशेषकर उत्तराखण्ड वासियों को ये उत्कृष्ट कृति भेंट करने के लिए। 

‘भयमुक्त बुग्याल’ अपने शीर्षक और आवरण से ही सम्मोहित करना शुरू कर देती है। हरेक कहानी सामाजिक सरोकारों का ही प्रतिबिम्ब लगती हैं, जैसे हम अपनी ही आंखो से सब होता देख रहे हैं, वही रूढ़ियाँ, वही मानसिक कमज़ोरियाँ, वही राजनीति, वही सामाजिक विघटन! सब कुछ वही जिसे हम महसूस करते आ रहे हैं, लेकिन ये कहानियाँ हमारी उन सुप्त संवेदनाओं को जगा देती हैं।

किताब का शीर्षक जिस कहानी से लिया गया है, ‘भयमुक्त बुग्याल’भेड़-बकरी-मेढ़-लंगोठों के रूप में हम लोगों की ही कहानी है। आज के दौर में भी हम इंसानों के बीच कुछ ऐसे ही भेड़िए हैं, जो आन्दोलनों को बिखरने, उनमें फूट डालने का काम तेजी से करने लगे हैं। इन आन्दोलनों में भी भयमुक्त बुग्याल की उसी कल्पना का अक्स दिखता है। जाॅर्ज औरवै ने भी शायद ऐसी ही कुछ कल्पना की होगी एनिमल फार्म जैसे कालजयी सृजन के समय!

उत्तराखण्ड आन्दोलन उसके परिणाम और अन्ततः हाथ लगी हताशा का सटीक चित्र खींचती है कहानी, ‘रतन सिंह को बालिग होने की बधाईयाँ’।

एक कहानी है, ‘साझा मकान’। इस कहानी में बैंडोली गाँव का सन्दर्भ पढ़कर कहानी से अजीब सी आत्मीयता हो गयी। बैंडोली के बाद आता है मलेटी गाँव, मेरा पैतृक गाँव है। मैं जानती हूँ कि एक दौर में बैंडोली, दुब्तोल़ी गाँव के कारीगरों की पूरे गढ़वाल में तूती बोलती थी, वहाँ के कारीगर बड़े प्रसिद्ध होते थे, जो महीनों-महीनों दूसरे गाँवों में म्वौरी-ख्वल़ी पर नक्काशियों के लिए गए होते थे। लेकिन अब ये पुश्तैनी काम नहीं रहा। सुना है, अब तो रोंट बनाने का सांचा ढालनेे वाला भी नहीं रहा वहाँ कोई!

समय साक्ष्य, देहरादून से वर्ष 2018 में प्रकाशित, ऐसी ही बेहतरीन कुल दस कहानियों का संकलन है, ‘भयमुक्त बुग्याल तथा अन्य कहानियाँ’। हो सके तो, पढ़िएगा।

मंगलवार, 8 दिसंबर 2020

"वूं मा बोलि दे": गणेश खुगशाल 'गणी'

 "वूं मा बोलि दे"






गणेश खुगशाल 'गणी' भाईसाहब द्वारा गढ़वाली मे रचित कविताओं का ऐसा संग्रह है, जिसकी एक एक कविता का अपना संसार है, अपनी गाथा है! 

 हमारे पहाड़ मे प्रचलित नये- पुराने दैनिक उपयोग के  साजो- सामान, हमारी दिनचर्या के हिस्से रहे मुहावरे-लोकोक्तियाँ, परिस्थितियों के अनुरूप उपजते भाव और आचार-व्यवहार..   कितने सामान्य प्रतीत होते हैं न, लेकिन इन कविताओं ने जैसे उनमे भी प्राण प्रतिष्ठित कर दिये हों! 

केदार आपदा से जुड़ी कविता 'हे भगवान' बेचैन  कर देती है, जैसे दर्द से भरी आत्मा की चीत्कार है ये कविता!

'भुक्कि'!  बरसों से कहीं खोयी हुई थी। इस शब्द में जो स्नेह है, वात्सल्यता है वो मुझे याद दिलाता है, जब माँ कहती थी, औ यख औ, यौक भुक्कि त देदे! 

मैने कहा न, इसकी हर कविता का अपना संसार है!

हमारी बोली भाषा और सांस्कृतिक विरासत को सहेजती दुलारती और समृद्ध करती ये खूबसूरत किताब हर लिहाज़ से नायाब है, जिसे हर पुस्तकालय मे होना चाहिये, जिसे पढ़ा जाना चाहिए ।

कितने सरल हैं गणेश भाई! कितनी सहजता से लिखा है उन्होने, कि  किताब लिखने से पहले मुझे डर था कि कहीं कोई कुछ कह न दे और किताब लिखने के बाद मुझे डर है कि कहीं कोई कुछ भी नहीं कहे! आपने तो निशब्द कर ही दिया है पाठक को! आपका आभार कैसे व्यक्त करें?

कुल 68 कविताओं का वृहद संकलन है इस किताब में जिसे विन्सर प्रकाशन ने 2014 मे छापा है । इस किताब की "अन्वार" (आवरण) का श्रेय जिन्हे गया है, वो तो मुझे अजीज़ हैं ही।

इस किताब का आमुख लिखते हुए माननीय श्री नेगी दा ने इसमे शामिल कविताओं के सार-तार के रूप मे उनकी ऊँचाईयों का खाका पहले ही पन्ने पर खींच कर रख दिया है।

इस किताब को पढ़ते हुए सोचती रही हूँ, कि हम कहाँ आ गए हैं, इतनी प्यारी भाषा को हम पीछे छोड़ते जा रहे हैं, हमसे अपनी भाषायी विरासत को ही सम्भाल  कर न रखा गया! भाषा से दूर होते जाना, मां से बिछुड़ना ही तो है! और हम तो शायद आखिरी पीढ़ी होने जा रहे हैं, अपने वंश की जो गढवाली बोल - पढ़ रहे हैं!

वाकई "गणेश खुगशाल" होना आसान नहीं है। अपनी बोली भाषा अपनी पहचान को बनाये - बचाए रखने के लिये उनकी कोशिशों के हम साक्षी हैं और निसन्देह हम सब उनके ऋणी  हैं। 'धाद' पत्रिका हमे उनकी, नवानी जी की और पूरी टीम की जी तोड़ मेहनत के बाद ही मिल पाती है, जिसका हर अंक संग्रहणीय होता है।

इतना सब लिखने के बाद भी मन ग्लानि से भरा हुआ है कि,  अपनी बात गढ़वाली मे लिखने का साहस न कर पायी मैं!

बुधवार, 30 सितंबर 2020

बुधवार, 2 सितंबर 2020

 

कफरनहूम (Capernaum), जिसे फिल्म भर तो नहीं कहा जा सकता!
 
सन् 2018 में बनी ये फिल्म अरबी भाषा में है, लेकिन इस पूरी फिल्म में कलाकारों के भाव ही संवाद बन जाते हैं। इसके मुख्य किरदार उन्हीं झोपड़ियों - तंग गलियों से हैं और वैसी ही ज़िन्दगी जीते रहे हैं (फिल्म रीलिज़ हो जाने से पहले तक), जैसा फिल्म में दर्शाया गया है, इसलिए कुछ बनावटी नहीं, कोई दिखावा नहीं, फलसफों से इतर सही मायनों में तो ये फिल्म न जाने कितनों की बायोपिक होगी, जिसे देखते हुए लगता है कि ये फिल्म से बढ़कर एक गुथी हुई डाॅक्यूमेण्ट्री है।
ये फिल्म आप्रवासियों और उनमें भी ज्य़ादा बच्चों, के दर्द से भरे हर नये दिन के जीवन संघर्ष की दर्द भरी कहानियों का दस्ता है। सच कहूँ तो इस फिल्म के बारे में “कुछ भी” कहने में मुझे हिचकिचाहट हो रही है क्योंकि मैं जानती हूं कि, संवेदनाओं के स्तर पर जिस चरम को ये छूती है, वहाँ तक मेरे शब्द नहीं पहुँच पाएंगे। इस फिल्म को देखते हुए मैं बहुत सुबकी साथ ही मन के किन्हीं कोनो में वो लोग भी सिसकते महसूस हो रहे थे, जिनके पास अपनी ‘कागजी’ आईडिंटी नहीं होती। देश की सीमाएं सत्ताओं को तो भाती हैं, उनका प्रबन्धन जो आसान हो जाता है, उनके हित जो सध जाते हैं, लेकिन आम आदमी जिसे, सिर्फ रोटी - कपड़ा और मकान की दरकार रहती है, ये सीमाएं कितनी ही बार उसकी इन आधारिक सुविधाओं से भी उसे महरूम कर देती हैं। क्यों होती होंगी ये सीमाएं!☹ 
बंगाल.....आसाम...सीरिया....लेबनान! आप्रवासियों का संकट सभी जगह एक है, पहचान का संकट! जो उन्हें जीवन के बहुत ज़रूरी हकों से महरूम कर देता है, और फिर शुरु होते हैं युद्ध! और किसी भी युद्ध की कीमत सबसे ज़्यादा बच्चे और औरतें ही चुकाते हैं, हम जानते हैं।
याद है, पा फिल्म का वो दृश्य जिसमें औरो (अमिताभ बच्चन) सफेद ग्लोब बनाता है, एक सीमा रहित - शान्ति - सद्भाव से भरी दुनिया का प्रतिरूप! काश ऐसा हो पाता!
फिल्म हमें लेबनान के हालातों से जूझते लोगों के करीब ले जाती है। इस फिल्म में हर किरदार अहम् है, लेकिन मुख्य है, ज़ेन, एक बारह साल का बच्चा। ज़ेन अपने माँ - बाप पर कोर्ट में मुकदमा लगा देता है, आरोप है- इन्होने मुझे जन्म दिया ! ये आरोप सिर्फ फिल्म में दिखाए गये ज़ेन के माँ - बाप पर ही लागू नहीं होता बल्कि हर उस समाज के चेहरे पर चिपका हुआ है, जहाँ बच्चों से उनका बचपन बड़ी क्रूरता से लूटा जा रहा है। फिल्म ऐसे मजबूर माँ - बाप का जूता भी तटस्थता से सामने रखती है, जिसमे हम और आप अपने पैर नही डाल सकते, जो हर संभव सुख अपने बच्चों को देना तो चाहते हैं, लेकिन उस सुख का कतरा भी जब अपने पास न हो तो वो कैसे और कहाँ से बच्चों को उनके हिस्से का हक़ दें? भूख मिटाने के लिए आखिरी साधन ही जब अपराध की दुनिया से आता हो, तो कैसे न वो खु़द को और अपने बच्चों को अपराधों के हवाले करें? ज़ेन, राहिल, योनास, सहर.... इस फिल्म का लगभग हर किरदार उस जीवन को जी रहा था, जिसे फिल्म के माध्यम से हमारे सामने लाईं, फिल्म की निर्देशिका- नादिन लाबाकी। नादिन का निर्देशन और कहानी दोनो बेशुमार तालियों के हक़दार हैं। नादिन जो खुद भी लेबनान से हैं और सिविल वार से पैदा उन त्रासद परिस्थितियों की गवाह रही हैं।
इस फिल्म का अंत इतना सुखद है, कि यकीनन आप भी भीतर तक भीग जाएंगे और इस पर भी गुड़ सी मिठास इस खबर में है कि, इस फिल्म के बाद ज़ेन (ज़ेन अल हज्ज), राहिल(योरदानो शिफेराॅ) और योनास (सबसे छोटा हीरो-बी ट्रेजर बैंकोले) की दुनिया ही बदल गयी।
( असली नाम बड़े कठिन हैं,सही उच्चारण हेतु कृपया गूगल कर लें😃)
⚘⚘⚘⚘⚘⚘
इस फिल्म ने मुझे इतना प्रभावित किया है कि, मै पिछले तीन दिनों से समय मिलते ही फिल्म से जुड़े लोगों के बारे में जानने के लिए इण्टरनेट खंगाल रही हूँ!
और आखिरी एक बात....
Did you know that every two hours the nations of this world spend as much on armaments as they spend on the children of this world every year?
-- Peter Ustinov

 

शनिवार, 29 अगस्त 2020

 

इकिगाई:
क्या मुझे मालूम है कि मेरा इकिगाई क्या है?
जवाब है नही, अभी तक तो शायद नही ही!
जब से इस किताब को पढ़ना शुरु किया और आज इस किताब को पूरा पढ़ लेने के बाद तक मै यही सोच रही हूँ, कि मैं नही जानती मेरा जीवन का वो उददेश्य क्या है, जिसे पाने के लिये मै सबसे ज्यादा उत्साही हूँ या जिसे पाने के लिये मै जो प्रयास करुँ वो मुझे सबसे ज्यादा आनंदित करें। यूँ तो मेरा हर दिन व्यस्तता के बीच गुजरता है, जिसमे से अक्सर मैं कुछ घन्टे व्यायाम करने, पौधों को छूने-निहारने-सहलाने, फिल्में देखने, अखबार पढ़ने, सहेलियों से गप्पाने और किताब पढ़ने जैसे अपने प्रिय शगलों के लिये निकालने की कोशिश करती हूँ, मुझे घूमने के भी खूब अवसर मिलते रहे हैं। अपने दफ्तर के काम को भी मै खूब आनन्द के साथ करने की कोशिश करती हूँ, जितना challanging काम आता है, मै उतनी ही ऊर्जित हो जाना चाहती हूँ। ज़रूरत के समय मै अपने सिर पर स्नेह प्रेम और आशीष की छांव भी पाती रही हूँ। मेरे कुछ सपने कुछ ख्वाहिशें अभी बाकि भी हैं, जिन्हे मै पूरा करना चाहती हूँ।
कुल मिलाकर, अपने इकिगाई को पाने के रास्ते मे पड़ने वाले उन सब milestones, जिनकी तरफ ये किताब इशारा करती है, की थोड़ी बहुत उपस्थिति मेरे जीवन मे है, लेकिन मै संतुष्ट नही हूँ, और सन्तोष का वो पड़ाव ही इस किताब की आखिरी मंजिल है, जो मुझे ढूँढना है! एक कसमसाहट जो बनी रहती है, कि सिर्फ ये ही तो मुझे नही करना था! समाज को कुछ भी न लौटा पाने का मलाल जो मेरे इन्द्रधनुष के से आसमान का रंग फीका कर देता है, उस अपूर्णता से पार पाने की संभावनाओं को अपने आज मे खोजना है, वही तो होगा, मेरा इकिगाई!
हेक्टर गार्सिया और फ्रांसिस मिरेलस ने ये किताब लिखी है। इकिगाई एक जापानी संकल्पना है, जिसका अर्थ चंद शब्दों मे नही बताया जा सकता लेकिन, कह सकते हैं कि जीवन को आनंद और सन्तोष के साथ जीने के लिये एक अच्छा मकसद ही आपका इकिगाई है। इसमे समाज की चिंता को शामिल किया गया है, victor फ्रांकल जिन्होने नाजियोँ की बर्बरता को सहकर भी अपना इकिगाई पाया और logo therapy विकसित की, जिसने हजारों लोगों को नया जीवन दिया, की theory को विस्तार से बताया है। इस किताब ने मुझे rejuvenate किया है, ये उन सभी किताबों से अलग है, जिन्हे कुछ लोग motivational book के नाम पर बस अलग रैपर मे परोस देते हैं।
पहले ही मुझे जापानी trends आकर्षित करते हैं, इस किताब ने तो मेरे उन आग्रहों को जड़ें ही दे दीं हैं। 😄

(this book reminds me of movie by akira kurosawa, village of the watermills.)


 

सोमवार, 23 सितंबर 2019


मसूरीः पहाड़ों पर टिका तारों भरा आसमान

 अपने टैरेस से मसूरी को लगभग हर रोज़ देखती हूँ। जैसे जैसे रात साँझ को सोखने लगती है, वैसे वैसे ये शहर  और ज़्यादा टिमटिमाने लगता है, घुप्प अंधेरे में और नज़दीक दिखने लगता है। लगता है जैसे तारों भरा आसमान फिसलता हुआ, सामने की पहाड़ी पर टिक गया होे।  मेरे लिए ये शहर हमेशा एक नई दुल्हन सरीख़ा आकर्षक रहा है, इसकी खूबसूरती अप्रतिम है। बारिश के बाद जब मौसम में बादलों का कोई अंश नहीं बचता, धूल ज़मींदोज़ हो जाती है, तब मसूरी सिर्फ एक टूरिस्ट स्पाॅट भर नहीं रहता, तब मसूरी तरंगित हो उठता है, तब उसे देखना एक पुराने गीत को सुनने जैसा नौस्टाल्ज़िया बन जाता है। देहरादून से मसूरी तक का सर्पीला रास्ता भी बड़ा ही रोमांचक है। जिस देहरादून को हम पीछे छोड़ आते हैं, वो अगले ही पल सड़क के एक ओर नीचे बिछा हुआ दिखने लगता है। रात में तो ये नज़ारा ठीक दिवाली का एहसास कराता है, एक बड़ा सा थाल, दियों भरा!  इस लुत्फ़ को उठाने के बहाने से न जाने कितने ‘व्यू प्वांइट’ की दुकानें चल पड़ी हैं इस रास्ते पर। पिछले कई सालों से मसूरी जाने के बहुत मौके मिल रहे हैं, इतने कि, वहां की सड़कें, गलियां, दुकानें सब आँखों में बस गये हैं। मैगी, उबला अंडा, आमलेट, भुनी मक्की, मोमोज, गर्म कढ़ाई वाला दूध, काॅफी और पान ये सब वो चीजे़ हैं, जिन्हें खाने का मज़ा मानो मसूरी में ही है। इस पहाड़ी शहर के दूसरे हिस्से जैसे कैमल बैक रोड़, हाथी पांव, कम्पनी गार्डन, गन हिल पाॅईंट या दूसरी नामचीन जगहों को देखने का कोई लालच मन में रहता ही नहीं, मेरे लिए पूरा का पूरा मसूरी माॅल रोड में ही बसा है। 

इस बार भी शाम को यूं ही चल दिए थे हम मसूरी को महसूस करने। लगभग सात बजे मसूरी पहुँचे थे। वहां पहुंचते ही सर्द हवा ने सिहरन पैदा कर दी, लेकिन उस ठण्डी हवा में कोहरे की वो खुशबू घुली थी जो दूर हमारे गाँव की आबोहवा में बसी होती है, और इस तरह मसूरी में मैने अपना गाँव भी महसूस किया। स्ट्रीट फूड्स की महक से बहकती सड़कें, दुकानों की चकाचौंध, पर्यटकों की आवाजाही, मसूरी का मिज़ा, सब कुछ खुशनुमा लग रहा था। इस बार तो 9 डी शो का भी मज़ा लिया हमने मसूरी में, पांच मिनट के वो वर्चुअल इफैक्ट्स जो आपको दूसरी ही दुनिया में ले जाते हैं, कमाल लगा। इधर मन दौड़ रहा था, उधर घड़ी की सुईंया। गहराते अँधेरे के साथ धीरे- धीरे सड़कों पर सन्नाटा छाने लगा, होटलों के कमरों की बत्तियां बुझने लगी, सड़क किनारे लगे शामियाने सिमटने लगे, लग रहा था जैसे सड़कों की चौड़ाई भी यकायक बढ़ गयी है! और फिर इस मदमस्त खामोशी को अपने खीसों में भरकर, हमने मसूरी को अलविदा कह दिया, रात के लगभग दस बज चुके थे।

अब अगली दफा, विंटर लाईन से मिलने ..................., आप भी चलेंगे, मसूरी?



बुधवार, 3 जुलाई 2019

हमारी दक्षिण भारत की आठ दिवसीय यात्रा, दिनांक 03.01.2019-10.01.2019
इस साल की शुरूआत भी पिछले दो सालों की तरह यायावरी के नाम रही। इस बार समूह में घूमने की योजना बनी थी, हम और हमारे ही समरस तीन परिवार और, जगह चुनी गयी- चेन्नई- महाबलिपुरम- पाॅण्डीचेरी। हमने लगभग पांच महीने पहले से यात्रा टिकट और होटल बुकिंग की कार्यवाही शुरू कर दी थी, ताकि मौके पे कोई परेषानी न हो, टिकट बुकिंग की ये ज़िम्मेदारी मैने सहर्ष स्वीकार कर ली थी, मैं इस मामले में आत्मविष्वास से लबरेज़ हूं, हां, ये डर तो था कि, मेरा निर्णय पता नहीं सब को ठीक लगे या नहीं लेकिन हर चीज निष्चित करने से पहले मैं दूसरे तीनों परिवारों की सहमति भी ले लेना सुनिष्चित करती जा रही थी। प्रीबुकिंग, एक महत्वपूर्ण फैसला होता है, क्यांेकि आप सिर्फ इण्टरनेट पर उपलब्ध सूचनाओं के भरोसे होते हैं, उनक सटीक विष्लेषण में गलती हो जाने की संभावना बनी रहती है, लेकिन सच कहूं तो, इण्टरनेट खंगालना मुझे रोमांचित करता है, उतना ही जितना किसी नई जगह को टटोलने में मज़ा आता है। इसीलिए गूगल अर्थ मुझे बहुत प्रिय है। नई नई जगह के बारे में जानना, लोगो के रिव्यूज़ पढ़ना और जो मैने महसूस किया वो लोगों को बताना अच्छा लगता है। किसी भी यात्रा को लेकर मेरा उत्साह चरम् पर होता है, वहां की तस्वीरें निहारना, उन जगहों के बारे में लोगों की राय-षुमारी जानना, वहाँ की ख़ास चीज़ों के बारे में पढ़ना बहुत भाता है। अपनी इस यात्रा से पहले भी मैने बहुत कुछ उन जगहों के बारे में जाना, पता चला कि महाबलिपुरम् में इस दौरान ही नृत्य समारोह होता है, पाॅण्डीचेरी में भी योग महोत्सव होगा तो दिल खुष हो गया। हम सबके लिए, सबसे मुफीद एयर टिकट, रेलवे टिकट और होटल की खोज खबर करने में मैने कई दिन कई घंटे इंटरनेट की सेवा में गुज़ारे। ट्रैवलिंग एजेन्सियों से बात की, होटल प्रबन्धकों से बात की। समुद्र से सटे होटल ढूंढते ढूंढते मैं सी साईड गैस्ट हाऊस, पाण्डीचेरी और टीटीडीसी बीच रिज़ाॅर्ट महाबलिपुरम पहुँच गयी और चेन्नई में भी लोगों के रिव्यू के आधार पर ही मैने गिण्डी में ट्रीबो का गेस्ट हाऊस चुना। समूह के होमोजिनियस होने के लाभ यही हैं, कि आप के फैसले काॅमन होते हैं!
इस यादगार बनने जा रही यात्रा के लिए कितने ही महीनों से मन उमंग से भरा जा रहा था, कम से कम कपड़े रखने हैं, फालतू सामान नहीं ले जाना है, सबसे आरामदायक जूते ले जाने हैं, कुछ ज़रूरी दवाईयां भी रखनी है, क्रीम-ग्लीसरीन और रोज़मर्रा के ज़रूरी सामान जैसी चीजें़ भी पैक करनी हैं। हम तीन लोगों के लिए सिर्फ दो सूटकेस रख़ने की इजाज़त मिली थी हमें अपने घर के ‘एचओडी’ से। ‘सफर आसान बनाना है तो सामान कम ही अच्छा होता है’, बस यही हर बार हमारी यात्रा की तैयारी का आधारभूत सिद्धान्त होता है, लेकिन अफसोस, मैं खु़द इस सिद्धान्त की बखिया उधेड़ देती हूं!
हम तीन जनवरी 2019 की कड़कड़ाती सुबह में देहरादून रेलवे स्टेषन पर साढ़े चार बजे से भी पहले पहुँच चुके थे, एक- एक कर चारों परिवार, उत्साहित, उल्लासित, प्रफुल्ल्ति और प्रसन्नचित्त रेलवे के इस सफर में साथ हो चले थे! और, दिल्ली से रेल का दामन छोड़, आगे हवाई सफर पर निकल पड़े। मौसम साफ था, सो रास्ते में, जहाज की छोटी से खिड़की से नीचे झिलमिलाते शहर दिखाई पड़ते थे, और चंद घंटों में ही हम दक्षिण भारत के प्रसिद्ध शहर चेन्नई पहुँच गये। एक बात, जो मुझे हमेषा याद रहेगी, वो ये कि, गिण्डी का ट्रीबो होटल जो एयरपोर्ट से महज सात किलोमीटर दूर था, वहाँ पहुँचने में हमें घण्टों लग गए, गलियों में भटक कर आखि़रकार हम पहुँच तो गये थे, लेकिन लोकल आॅटो ड्राईवरों के चालाकी भरे रूख़ ने चेन्नई की इज्ज़त मेरी नज़र में कम कर दी थी, उनके बुरे व्यवहार ने मुझे उत्तेजित कर दिया था। किसी भी शहर की छवि वहाँ के लोगों के पहले-पहल मिले रवैये से बन जाती है। जब हम होटल के कमरों में गए तो मन को कुछ सुकून मिला। वो वाकई एक अच्छा होटल था, साफसुथरा और शान्त। ये होटल रेज़िडेन्षियल इलाके में था, इसलिए ढ़ूढने में इतना समय लगा, लेकिन ऐसे इलाके में होने के कारण ही ये इतना शांत भी था। 
तीन तारीख़ की रात बीती, थकावट से भरी लेकिन यादगार। अगली सुबह, होटल का ज़ायकेदार नाष्ता, चाय, काॅफी, दक्षिण भारतीय व्यंजन और गुनगुना मौसम, ये सब समेट लेने जैसा आनंददायक था। मैं यात्रा के दौरान बहुत अनुषासित तरीके से रहने के पक्ष में नहीं रहती, ये चिंतामुक्त और आनंदयुक्त रहने का समय होता है, यदि अनुषासन स्वतःस्फूर्त है तो वाज़िब है, लेकिन यदि जबरन अपनाना पड़े तो ये मेरे यात्रायी स्वाद को फीका करता है। मैं एक - एक पल का आनंद लेना चाहती थी और मैने लिया भी। होटल में खड़े एक पेड़ पर आंवले जैसा फल खूब लगा था, मेरी नज़र उस पर सुबह से ही थी। हम सब तैयार होकर चेन्नई घूमने के लिए तैयार थे, ट्रैवलर गाड़ी भी मौके पर ही बुक कर बुलवा ली थी, बस गाड़ी में बैठने से पहले मैने जमीन पर गिरे उन फलों को चुग लिया। स्वाद बिलकुल आंवले जैसा, लेकिन आंवले से मुलायम और ज्यादा रसीला, आकार में भी थोड़ा छोटा, मैंने देहरादून लौटकर उस फल का वैज्ञानिक नाम ढूंढा, तो मैं हैरान थी, ये आंवला ही था, phyllanthus emblica.
चेन्नई एक व्यस्त शहर है, बहुत घना और काफी हद तक अव्यवस्थित। बहुत सारे मंदिरों से पटा हुआ। लगभग तीस किलोमीटर की यात्रा के बाद हम पहुँचे अन्ना ज़ुलोजिकल पार्क। मेरी सोच से कहीं बड़ा, खुला-खुला। यहां पहुंचते ही त्रिवेन्द्रम का चिड़ियाघर याद हो आया। इस बड़े से जू़ मे हमने समय बचाने के लिए बैटरी चलित रिक्षा में जाना बेहतर समझा, लेकिन हमारी बारी आते आते समय इतना बीत चुका था कि, अब हमारा उत्साह ठण्डा होने लगा था। इस सब के बीच दिल को जो छुआ, वो ये कि इन गाड़ियों की चालक महिलाएं थी, यूनिफाॅर्म में। अन्ततः हमने इस बैटरी की गाड़ी का मज़ा लेते हुए चिड़ियाघर का थोड़ा बहुत दीदार किया, जो कुछ देखा वो नायाब था। मैने ज़ेब्रा और ज़िराफ शायद दोनो पहली बार देखे। मगरमच्छ, सांप, कछुए, भालू, शेर, बंगाली चीता, ढेरों चिड़ियां और न जाने क्या- क्या! चेन्नई मंे इस चिड़ियाघर को ढंग से न देख पाने का मलाल रहा, सो लौट कर आई तो विकीपिडिया में इस चिड़ियाघर के बारे में और भी बहुत कुछ जाना। ये अनुभव भी बड़ा मजे़दार था, इतने बड़े समूह में किसी को कोई जानवर देखने में मज़ा आ रहा था तो किसी का मन किसी दूसरे जानवर पर अटका हुआ था, तो कोई थका हारा गाड़ी में ही बैठा रहा। उसके बाद हम लौटे तो सीधे मरीना बीच पर रूके, मरीना, एषिया का सबसे बड़ा बीच। हम में से कुछ ने तो पहली बार समुद्र तट देखा था, मैं अपने ग्रुप में अकेली यात्री थी, जिसने अलग-अलग समुद्र तट सबसे ज़्यादा संख्या में देखे थे, आह्हा, भले ही उंगलियों में गिने जा सकने लायक हों! शाम घिरने लगी थी, लेकिन मन समुद्र की लहरों की तरह ही लौट लौट कर समुद्र में मिला जा रहा था। वक़्त की पाबंदी ने हमें वापिस गिण्डी पहुँचा दिया, समय की किल्लत इस कदर थी कि, मरीना बीच से सटा जयललिता मैमोरियल भी वहां जाकर न देख पाये, जबकि वो मुझे बहुत आकर्षित कर रहा था। थके हारे परिंदो की तरह अपने अपने कमरों में लौट गये और फिर दिल में अगले दिन की यात्रा को लेकर मन उड़ रहा था। 
अगले दिन यानि पांच जनवरी को हम चले सीधे पाॅण्डीचेरी की ओर। हम उन सुन्दर चैड़ी चैड़ी सपाट सड़कों पर गाड़ी में गाते बजाते हुए मस्त थे, लेकिन जब हल्ला-गुल्ला बंद हुआ तो बीच बीच में मुझे ऐसी आवाज आने लगी जैसे कोई ज़ोर से किसी की कमर पे थपकी दे रहा हो। देखा तो ड्राईवर चलती गाड़ी में अपने गाल पर थप्पड़ मार रहा था, कभी अपनी पानी की बोतल खोलता और अपने मुंह पर पानी की छपाक दे मारता, ये डरावना था। हम समझ चुके थे कि हमारी गाड़ी का ड्राईवर अपनी नींद से लड़ रहा है। हमने उसे कहा कि वो रूक कर आराम कर ले, लेकिन वो सीधे एक टाॅल पर ही रूका, उसके बाद उसने ऐसी हरकत नहीं की, मगर हम थोड़ा डर तो गए ही थे। टाॅल पर दो महिलाएं हमें बेचने के लिए कच्चे बड़े आम लाईं और कुछ घास जैसी चीज़ भी, जिसकी जड़ खाई जाती है, हमने वो खरीदी और खाकर देखी, लेकिन हमारी जीभ के स्वाद तंतुओं ने उस अजनबी चीज़ को स्वीकार ही नहीं किया। अब पाण्डीचेरी नज़दीक था। पाण्डीचेरी में हमारा पहला परिचय वहां की यातायात पुलिस से हुआ। ड्राईवर ने गाड़ी गलत स्ट्रीट में मोड़ दी थी, सो उसका चालान हुआ मगर उनका व्यवहार सौम्य था। फिर हम पहुँचे मेरे ड्रीम लैण्ड- पाण्डीचेरी, और ठिकाना हुआ- सी साईड गैस्ट हाउस। पाण्डीचेरी मैं एक बार उन्नीस सौ अठानवे में, मैं आ चुकी थी, उस यात्रा की भी बहुत सी यादें आज भी ताज़ा हैं, खासकर एक रेस्टोरेण्ट वाला वाकया तो हमारी मुफलिसी और इस अन्जान शहर में हमे मिले अपनत्व की ऐसी कहानी है, जो मैं न जाने कितनी बार कितने ही लोगों को सुना चुकी हूं, तब सोचा था यहां दोबार ज़रूर आऊंगी, लेकिन आज का पाॅण्डीचेरी बिलकुल नया लग रहा था, ग्लैमर से भरपूर। अपने ठहरने की जगह यानि सी साईड गैस्ट हाउस को मैने इण्टरनेट पर इतनी बार देखा था कि, उसके सामने की सड़क और उसकी बाउण्ड्रीवाल से ही मैने उसे पहचान लिया था। वो मेरी कल्पना से भी ज़्यादा बेहतर लोकेषन पर मिला। गेस्ट हाउस के ठीक सामने कुछ फुट की दूरी पर ही था-प्रोमिनेड राॅकी बीच। लहरें राॅकी बीच से टकरातीं तो उनके छींटों से हमारा तन और मन दोनो ही गीले हुए जाते थे।शाम हमने बीच पर ही बिताई। खूब घूमे- खूब टहले। लड्डूनुमा पेस्ट्री चखी, चाय पी, काॅफी पी और दुकानों का जायज़ा लिया। वहाँ योग महोत्सव चल रहा था, और पीछे टेण्ट में मेला सा लगा था, जिसमें गोलगप्पे खाने का मोह मैं न छोड़ पाई। सी फूड के भी बहुत सुन्दर व्यंजन दिखायी दे रहे थे, लेकिन मछली के अलावा और कोई भी पानी का जीव मैं नही खा सकती। ख़ैर, ये एक सुहानी शाम थी। कुछ समय के लिए मैं अपनी जान के एक हिस्से को भूल  कर दूसरे हिस्से के साथ कुछ ऐसी मषगूल हो गयी कि, पता ही नहीं चला कब हम हिस्सा-हिस्सा एक होकर अपने साथ के लोगों से छिटक गए और बीच के किनारे किनारे कोने तक आ पहुँचे। हम एक दूसरी ही दुनिया में आ गए थे, जहाँ ज़िन्दगी चिड़िया के पंख से भी हल्की हो कर उड़ी जा रही थी। हमें कोई चिंता नहीं थी, कोई परेषानी भी नहीं। पता नहीं हम दोनो इतनी देरी तक किन विषयों पर बातें करते रहे होंगे, लेकिन हमने बहुत बातें की, वरना हम अक्सर बातचीत में विषयों की कमी से जूझते हैं। पाण्डीचेरी की पहली शाम बहुत प्यारी और रूमानी रही। हम लोगों ने अरविंदो आश्रम, मातृ मन्दिर और आसपास के इलाकों और प्रसिद्ध जगहों के बारे में जानकारी जुटाई। थोड़ा बाजार घूमे। मैने अलग-अलग सुगंध वाली हाथ की बनी अगरबत्तियां खरीदीं, जो मुझे बहुत पसंद है । पाॅण्डीचेरी में हमने लगभग हर घर के दरवाजे पर रंगोली बनी देखी, पूछने पर पता चला कि वहां मेहमान के स्वागत में ये रंगोली बनाई जाती हैं। अरे वाह, हमारे मुंह से अनायास ही निकला और ये विचार हम सभी को आया कि, क्या ऐसा भी होता होगा कि, जितना प्रिय मेहमान उतनी ही बड़ी और सुन्दर रंगोली? क्या मेहमान अपना कद मेज़बान की नज़र में, रंगोली के आधार पर नापता होगा? इन सारे सवालों की कड़िया हमने ऐसी जोड़ी कि हंसते हंसते लोटपोट हो गए। हम देर रात तक कमरे की बालकनी से लहरों को चढ़ते-उतरते देखते रहे, उनका संगीत कानों में रस घोल रहा था, बीच और गेस्ट हाउस के बीच में साफ सुथरी सड़क पर सिर्फ पैदल चलने की आज्ञा है, जिस पर लोगों की आवाजाही देर तक जारी थी, लेकिन शायद ग्यारह या बारह बजे के बाद वह भी निषेध है।
दूसरी सुबह सी साईड गैस्ट हाऊस की ओर से बेहतरीन नाष्ता करवाया गया। फिर हमारी सवारी मातृ मंदिर की ओर चली। मातृमन्दिर से ठीक पहले हम हनुमान मंदिर भी गए, हमने उस दिन अनावरित होती हनुमान की विषालमूर्ति को देखने के साथ वाद्य यंत्रों का जो आनन्द लिया वह भी यादगार रहेगा और प्रसाद के रूप में घी में बनी हुई वो जो सफेद खिचड़ी मिली थी, उसका स्वाद तो आज भी जीभ में यथावत् है। हनुमान मंदिर के बाद मातृमंदिर जाने के लिए गाड़ी कुछ दूरी पहले तक ही जाती है। जहां गाड़ी ने हमें छोड़ा, उससे आगे का पैदल रास्ता बहुत ही प्राकृतिक और मोहक था। हम एक एक पल को कैमरों में समेट लेना चाहते थे। रास्ते में हल्का नाष्ता लेने या फ्रेष होने की सुविधा भी थी, सामान थोड़ा महंगा था, लेकिन हमने अपने आनंद की कीमत के सामने उस लागत को कम ही आंका और प्रकृति की गोद में बैठकर छोटे स्टील के गिलासों में काॅफी का आनंद लिया। हमारे लिए ये संभव नहीं था कि, हम मातृ मंदिर में ध्यान योग कर पाते, सो हमने दूर से ही, एक पाॅइंट जो कि पूर्व निर्धारित है, वहां से मातृ मंदिर को निहारा।  सुनहरी सोलर प्लेटों से ढका  गोल ढांचा, योग का महाकेन्द्र है। दूर दूर से योगी-ध्यानी वहाँ ध्यान के लिए आते हैं। पाण्डीचेरी की हवा में एक शान्ति एक सुकून तो है ही। हमारी गाड़ी के ड्राईवर भी कोई भद्रजन थे, जो स्वैच्छिक भाव से अपनी सेवाएं आश्रम को ड्राईवर के रूप में दे रहे थे। उनकी ये बात बड़ी संवेदनापूर्ण लगी कि, पाण्डीचेरी में जो हर घर के आगे रंगोली बनाने की प्रथा है, दरअसल वो चिड़ियों-चींटियों जैसे जीवों को आटा-चावल से रंगोली बनाकर भोजन उपलब्ध कराने का माध्यम थी, उन्हें घर के बाहर ही जब भरपेट भोजन मिल जाता था,तो वो घर के भीतर आते ही नहीं थे, लेकिन अब अप्राकृतिक रंगों से रंगोली बनायी जाती है, जो जीवों के लिए तो नुकसान दायक है ही, खुद इंसान के लिए भी, क्योंकि अब जीव घर में आते हैं, नकली रासायनिक रंग वैसे भी नुकसान ही करते हैं। मातृ मंदिर से लौटे, भोजन किया और फिर दोबार गाड़ी में बैठकर पाॅण्डीचेरी की स्थानीय यात्रा पर निकल गए। गाड़ी में बैठी दूसरी सवारियों से भी दोस्ती सी हो गयी थी। आधे दिन की इस यात्रा में हमने अरबिंदो आश्रम, लाईब्रेरी, म्यूजियम, पार्क, बैसिलिका चर्च, बाॅटनिकल गार्डन और मंदिर क्या कुछ नहीं देखा। और फिर शाम आई, वही सुरमई। लहरें - हवा - सड़कें - दुकानें- पर्यटक सब के सब दिल को मोह रहे थे, सब गुनगुना रहे थे।
अगली सुबह यानि सात तारीख़ को हम सभी फिर एक नए शहर के आकर्षण में बंधे जा रहे थे, एक शहर जो इतिहास में एक स्तम्भ के रूप में दर्ज़ है, जिसकी द्रविड़ वास्तुकला पे दुनिया रीझती है- महाबलिपुरम् या मामल्लापुरम्। इस शहर में मैं एक बार पहले भी आ चुकी थी, वही उन्नीस सौ अठानवे में। लेकिन मुझे सी शोर मन्दिर के अलावा और कुछ भी याद नहीं है। भरी दोपहर में हमारी गाड़ी ने हमें महाबलिपुरम् में राज्य राजमार्ग उनचास के किनारे कई एकड़ जमीन में फैले तमिलनाडू टूरिस्ट डेवलेपमेण्ट काॅर्पोरेषन के बीच रिज़ाॅर्ट के मुहाने पर उतार दिया। ये जगह बहुत ही खूबसूरत थी। बहुत सारे पेड़ों ने पूरे एरिया को हरा-भरा बनाया हुआ था,इसे देखते ही मुँह से यही निकला-जंगल के बीच मंगल! मेन रिसेपशन से हम बैटरी गाड़ी में बैठकर अपने अपने कमरों तक गए, ये अनुभव भी गज़ब रहा। वहाँ जगह जगह स्कल्पचर लगे थे, एक स्कल्पचर पार्क भी था, बहुत सुन्दर जिसमें फववारे भी थे और हर उन स्कल्पचर के बारे में जानकारियां भी उद्धृत थीं। रास्ते  भर जगह- जगह भरतनाट्यम की मुद्रा  वाली मूर्तियां एहसास करा रही थीं, कि ये शहर नृत्य प्रेमी है और यहाँ हर साल होने वाले नृत्य महोत्सव इसे सिद्ध भी करता है। यहाँ कई टर्की चिड़ियाँ थीं, काली, सुन्दर और लाल कलगी वाली चिड़ियाँ सिर्फ किताबों और इण्टरनेट पर देखी थीं। इतना विषाल रिज़ाॅर्ट एरिया देखकर लग रहा था, कि इससे बेहतर शायद महाबलिपुरम् में और कोई होटल न होगा। कमरों के ठीक पीछे बीच, जिसकी लहरों की आवाजांे से मन बहकने लगा था, कि कब समुद्र को जाकर छूलें। पाम के पेड़, साफ सुथरी सड़कें, बच्चों के लिए रेत पर लगे ढेर सारे झूले, साफ नीले पानी वाला स्वीमिंग पूल और ज़रूरत भर का स्टाफ, सब कुछ था। ज्यों ही हमें कमरे अलाॅट हुए, और हमने अपने अपने कमरों को जांचा, तो मन खट्टा सा हो गया, इतनी बेहतरीन जगह, लेकिन कमरों की हालत जर्ज़र और खस्ता। कहीं पानी टपक रहा था, किसी के कमरे में लाईट काम नहीं कर रही थी, तो किसी का ए0सी0 ख़राब था। इन सब कमियों की ओर होटल में बैठे स्टाफ का ध्यान दिलाया तो देर रात में जाकर बामुष्किल थोड़ी बहुत सुनवाई हो पाई थी। इन तकलीफों से बच्चे अक्सर बेपरवाह होते हैं, उन्होंने तो तय कर लिया था, कि अब क्या करना है, पहुँचते ही कोई स्वीमिंग पूल गया तो कोई झूलों का मजा लेने लगा, कि सी ने रेत में धूनी रमाई तो कोई सड़क पर घूमने लगा। सब मस्त थे। शाम को हम बीच पर घूमे और फिर तैयार होकर आॅटो से सी शोर मंदिर चले गए जहाँ नृत्य समारोह चल रहा था। हमने दोनो ही दिन इस समारोह का भरपूर आनन्द उठाया। ख़ास बात ये कि इस समारोह में औपचारिक भर भी भाषण नहीं था, जिस कारण ये समारोह पूरी तरह से कला को समर्पित कहा जा सकता था। पूरे दो धण्टे चलने वाले इस समारोह में हम प्रथम पंक्ति के दर्षक रहे। उस अनुभव को तो शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता, लेकिन इतना कहा जा सकता है कि, अपनी लोक कलाओं और नृत्य परम्परा को ज़िन्दा रखने में इस कार्यक्रम की महती भूमिका को इतिहास ख़ुद में ज़रूर दर्ज करेगा। भरतनाट्यम दक्षिण भारत का प्रसिद्ध शास्त्रीय नृत्य है। कहते हैं, कि तमिलनाडू में यह शुरू में देवदासियों द्वारा किया जाता था, बाद में प्रसिद्ध नर्तकों द्वारा इसका प्रदर्षन कर, इसे विष्व पटल पर सम्मान दिलाया गया। मैने जो जाना वो ये कि यह नृत्य नाट्य शैली पर आधारित है, जिसमें कथा को नृत्य के माध्यम से अभिनीत किया जाता है। रात को नृत्य समारोह से लौटते हुए रिजाॅर्ट के नजदीक ही होटल में बढ़िया खाना खाया और गप्पें मारते हुए अपने कमरों में लौट आए। लेकिन अब भी हमारे दिलो-दिमाग पर नृत्य समारोह में दिखायी जाने वाले लोक कलाकारों की फूर्ति, भरतनाट्यम करती हुई नर्तकी की भाव-भंगिमाएं, वाद्य यंत्रों पर बैठे वादकों का और गायकों का सामंजस्य ये सब छाया हुआ था।
अगली सुबह यानि, आठ जनवरी को हम सुबह सवेरे बीच पर टहल आए। रिज़ाॅर्ट के रेस्टोरेण्ट में नाष्ता किया, चाय पी और महाबलिपुरम् को महसूस करने के लिए निकल पड़े। समुद्र पिछले चार-पांच दिनों में हमारे इतने करीब आ चुका था, कि अब हमारे भीतर उसे देखने के लिए पहले सी छटपटाहट नहीं रह गयी थी, यही तो है, प्रकृति का नियम। यहाँ आने से पहले मैने इस शहर के बारे में बहुत कुछ जानने की कोषिष की थी, यहाँ का इतिहास, भूगोल, भाषा - संस्कृति और  भोजन वगैरह। मैने  ये  भी पढ़ा था कि,महाबलिपुरम् में सेवन डी शो होता है, जिसमें वहां के इतिहास का वर्णन होता है, ये मुझे बहुत आकर्षक लगा, लेकिन उसकी बुकिंग का कोई लिंक नेट पर नहीं मिल पा रहा था, सोचा था, वहीं जाकर देखेंगे, लेकिन मालूम हुआ कि वो शो ज्यादा चल न पाने के कारण बंद हो गया था। हम सबसे पहले समुद्रतटीय मंदिर देखने गए। उसके बाद पंच रथ, अर्जुन पेनेन्स, बटर बाॅल, कृष्ण मंडप और फिर लाईट हाऊस देखा। लाईट हाऊस के भीतर जाकर थोड़ा डर लगा, लेकिन जब ऊपर पहुँचे तो पतली सी रेलिंग के सहारे लाईट हाऊस के चारों ओर घूम कर, वहां से शहर का नज़ारा देखने लायक था। नजदीक ही मैरीन सम्बन्धी म्यूज़ियम भी था, बहुत बढ़िया, पुराने से पुराने जहाजों, उनके सिग्नल देने की तकनीक, पुराने जमाने में लाईट हाऊस की रोषनी और भी न जाने क्या क्या। बच्चे हैरान होकर हर चीज को नजदीक से छूकर देख लेना चाहते थे।
महाबलिपुरम् में बिताया ये दिन हमें इतिहास के किन किन कालखण्डों में ले गया, क्या कहें। बस आँखे  तृप्त हुईं, मन था कि भरता ही न था, लेकिन किसी भी जगह रूकने और उसे तफसील से देखने की तो मोहलत ही न थी। उस दिन लौटकर फिर नृत्य महोत्सव का आनंद उठाया। रिज़ाॅर्ट के बाहर होटल में खाना खाया और अगली यात्रा की योजना बनाते हुए अपने अपने कमरों में लौट आए। उस रात काफी देर हम कमरे के बाहर बने लाॅन में बैठकर बतियाते रहे और बच्चे पार्क में लगे झूलों में - रेत में खेलते रहे।
हमारे घर लौटने की तारीख़ आ ही गयी थी, सो नौ तारीख की सुबह काउण्ट डाउन की तरह लग रही थी, हमें चेन्नई जाना था और हम चल दिए। चेन्नई में गिण्डी ट्रीबो होटल में हम अपना कुछ सामान छोड़ गए थे, सो हमारा सफर कुछ हल्का रहा। हम सही समय पर चेन्नई पहुँच गए थे, सो अपना कीमती समय बर्बाद किए बगैर हमने बचे हुए समय को चेन्नई के राजकीय म्यूज़ियम के नाम किया, इसे देखकर आँखे चैंधिया गयी थीं, इतना इतना विषाल संग्रहालय तो मैने मुम्बई और त्रिवेन्द्रम में भी नहीं देखा था, यूं ही नहीं इसे दक्षिण एषिया का सबसे बड़ा संग्रहालय कहा जाता है। इसमें 6 तो विषाल भवन हैं और 46 गैलरियां है, ये सूचना तो मुझे गूगल ने दी है, वरना हम तो इसकी आधी से भी कम गैलरियां ही देख पाए थे। इस संग्रहालय को फुरसत से देखने के लिए कई दिन चाहिए। यहां हर विषय-वर्ग से जुड़ी चीज़ों का भण्डार है। वाकई अगर हम इस संग्रहालय न आए होते तो हमारा चेन्नई आना बेकार हो जाता, भागते चोर की लंगोट ही सही!
संग्रहालय के बाद स्ट्रीट टी का मज़ा लिया और फिर होटल में लौटने से पहले चेन्नई के स्थानीय बाजार में सिल्क की साड़ियों का जायजा लेने चल पड़े। यूं तो अब बाजार देष - दुनिया की सीमाओं से बाहर आ चुका है और दक्षिण का कपड़ा उत्तर में भी लगभग समान भाव पर मिलने लगा है, लेकिन चित्त को कौन बुझाए? सो ना ना करते एक साड़ी मैने भी ले ही डाली। अब हम गिण्डी ट्रीबो के कमरों में लौट आए थे।
दस तारीख़ दो हज़ार उन्नीस, पंछी जैसे लौट ही जाता है अपने घोंसले में, हमने भी उड़ान भरी चेन्नई से दिल्ली के लिए और फिर वापिस रेल की सवारी दिल्ली से देहरादून की। इस तरह ये दक्षिण भारत की यात्रा मेरे जीवन का एक कीमती अनुभव बन कर मेरी यादों में जुड़ गयी।
इस सफर को इतना खूबसूरत बनाने के लिए मेरे सभी हमसफर साथियों का शुक्रिया।
सुनीता मोहन

बुधवार, 10 अप्रैल 2013

ऐ मेरे मन


ऐ मेरे मन
तुम्हे ऐतराज तो होगा
जो मैं कहूँ कि
तुम मेरे लायक नहीं या मैं तुम्हारे
कि तुम मैले, कलुषित और भौंडे हो चले हो
तुम रचते हो साजिश मेरे प्रेम के ख़िलाफ़
जब टूटते हैं मिथक
तो मनाने लगते हो मुझे
और मान ही जाती हूँ मैं
कि मन आखिर मेरा ही तो है
मगर तुम मेरे कहाँ हो, मन ?
होते तो, मुझे अन्तर्द्वन्द की भेंट न चढाते
मैं तुम्हारे अधीन जब-तब हो जाती हूँ
तुम हो कि मेरे वश में कभी नहीं आते
तुम मेरे भीतर कहीं हो, जो बरगलाते हो मुझे
मगर तुम्हारे भीतर कौन है
जो बोता  है तुममे अविश्वास , धोखे और घृणा के बीज
आज साफ़ करो सारी  बातें
या छोड़ दो मेरा पीछा और करने दो मुझे
दो बातें अपने प्रियतम से!

शुक्रवार, 22 मार्च 2013

फिर से ………!

माँ मुझे ढूंढ़ रही है पागलों की तरह
वो नहीं  जानती पिछली रात
मै गहरी नींद में थी जब
मुझे सहलाते हुए उसे नींद ने कब जकड़ा
वो भी न जान सकी
मुझे माँ से छुड़ाकर
उठा ले गया था वही
जो मुझे ढूंढने वालों की  जमात में
सबसे आगे है
एक अनजान अँधेरे कमरे के कोने में उसने मुझे पटका
मेरी आँख खुली
मै काँप रही थी-चिल्ला रही थी
उसके दांत मेरी  रूह को चबा रहे थे
मेरी तकलीफ से वो आह्लादित हो उठा था
फिर खुद को तृप्त कर
मुझे ख़त्म कर दिया उसने
कि कहीं मै उसके गुनाह का पर्दाफाश न कर दूँ
और इस तरह
डेढ़ बरस का 'स्त्रीत्व'
मिट्टी की तहों में
जज़्ब हो गया फिर से ………!




शनिवार, 19 जनवरी 2013

गरजे बदरा

गरजे बदरा
बरसा पानी
महकी मिट्टी
चहकी चिड़िया
भीगे पत्ते
भीगा  आँगन
नाचा मोर
खिला  वसंत ............
गरजे बदरा
सहमी मुनिया
टपका पानी
भीगा बिस्तर 
भीगी गुड़िया
बोली मुनिया
अब न आना 
प्यारे बदरा
डर लगता है ............


 

बुधवार, 21 मार्च 2012

नया सवेरा

सांध्यकालीन स्वर्णिम छटा में शीतल बयार तन के साथ ही मन को भी ठंडक दे रही है। अलकनंदा की कल-कल की चिड़ियों के कलरव के साथ संगीतमय प्रतिस्पर्धा चल रही है। पहाड़ों का नीलापन आसमान की नीलिमा के साथ प्रेमोत्सव मना रहा है। सीढ़ीदार खेत एक दूसरे को सहारा देकर ऊपर उठा रहे हैं। हरे भरे देवदार और बांज बुरांस के लाल फूलों को ललचाई नज़रों से देख रहे हैं और बुरांस अपनी ही मादक सुगंध में मदहोश हुआ जा रहा है.
आह! प्रकृति का ये अप्रतिम सौन्दर्य!
सर्पीली पगडंडियों से गुजरते हुए कल्पनाओं के भवसागर में तरता उतरता रामेश्वर इस नैसर्गिक सौन्दर्य पर मुग्ध हुआ जा रहा था, उसे यहाँ के कंकड़-पत्थरों में भी खूबसूरत नक्काशी दिखाई दे रही थी, नौले - खोलों के मीठे पानी ने उसे आकंठ तृप्ति से भर डाला था। उसके ह्रदय से कवितायेँ फूट रही थी.
इतनी रयिसियत के बावजूद भी यहाँ जवानियाँ लगभग गायब हैं, इंसानों के नाम पर सिर्फ कुछ बूढ़ी ज़िंदगियाँ कसमसाती साँसे ले रही हैं।
इंसान ही न रहे तो प्रकृति के इन उपहारों का आनंद कौन उठाये?
बिन बच्चों के आँगन जैसा सूनापन है इन पहाड़ों में और ये जंक लगी कुण्डियाँ, टूटे-जर्ज़र दर-ओ-दीवार, उदास तिबारियां सब मिलकर गवाही दे रहे हैं, कभी ये भी इतराया करते थे। बंजर पड़ गए खेतों में कभी हाड़-तोड़ मेहनत ज़रूर हुई है। ये सब लावारिस हाल में देखकर उसका जी फटा जा रहा था। वो उजड़े वीरान एक-एक दरवाज़े खिड़की से लिपट कर रोना चाहता था, हरेक आँगन को छू कर बता देना चाहता था कि अब तुम अकेले नहीं हो मैं लौट आया हूँ।
हमेशा हमेशा के लिए!

मंगलवार, 6 मार्च 2012

लोकतंत्र लौट आया है

उसकी आँखों में चमक है
कि अबके खूब लहलहाएगी फसल
उसके खेत में
कि उसे आश्वासन मिला है
बादल से
खूब बरसने का
सूरज से
धूप खिलखिलाने का
फिजाओं से
खुशहाली लाने का
कि अबके फिर लौटा है
लोकतंत्र
उसके द्वार पर
उसकी आँखों में सपने हैं
कि अब  जीवन संवरेगा
उसके बच्चे का
कि वो भी तारतम्य बैठा पायेगा
आधुनिक  युग के साथ
कि उसे आश्वासन मिला है
धरती के देवताओं से
टैबलेट, लैपटॉप और
मुफ्त पढाई का
कि अबके फिर लौटा है
लोकतंत्र
उसके द्वार पर
उसकी आँखों की  गहराइयों में बसी
सदियों की  पीड़ा से  सराबोर नमी
आश्वस्त है
कि हमे ही धोना है आखिर
एहसास
उसकी आँखों के धुंधलेपन का
कि अबके फिर लौटा है
लोकतंत्र
उसके द्वार पर
हर बार कि तरह ही !        

गुरुवार, 1 मार्च 2012

प्यारी मारिया

मुझे ड्यूटी से लौटने में देर हो गयी थी, सुनसान सड़कें कोहरे की चादर ओढ़कर नींद की आगोश में समा गयी थीं, सिर्फ कहीं कहीं पर स्ट्रीट लाइटों का उजाला अपनी बाहें फैलाता दिख रहा था और घने कोहरे के कारण वो भी सिमटा सिमटा सा था। घरों की बुझी बत्तियां मुझे हद से ज्यादा देर हो जाने का एहसास करा रही थीं। ये सन्नाटा मुझे हैरान करने से ज्यादा डरा रहा था। यूँ तो पहले भी कई बार ऑफिस से देर में घर लौटती थी। लेकिन दुकाने खुली होती थी, राहगीरों की चहल-कदमी से सड़कें झंकृत रहती थीं, सो डर ने मन में कभी घर नहीं किया। शायद इसीलिए आज भी ऑफिस से निकलते समय देर हो जाने का भान तो था, पर काम करते करते समय का पता ही नहीं चला, फाईलें निबटते ही पर्स उठाकर सीधे अपनी स्कूटी स्टार्ट की और बिना समय देखे चल पड़ी। २४ x 7 का ऑफिस है, इसलिए वहां तो हमेशा भीड़-भाड़ रहती है, पार्किंग में भी रौशनी का ऐसा इंतज़ाम है कि रात और दिन में भेद करना मुश्किल है। लेकिन आज मैं खुद पर हैरान थी कि मैंने ऑफिस में इतनी देर कर कैसे दी? सवालों के सैलाब मन में उमड़-घुमड़ करने लगे-लोग सड़कों से कहाँ नदारद हो गए? लोग जल्दी सो गए या यहाँ कोई बात हो गयी? ये विरानगी कैसी है? और भी न जाने क्या-क्या। रस्ते से एक अजीब सा अनजानापन महसूस हो रहा था, इस डरावनी स्याह रात में मुझे सिर्फ मेरी गाड़ी की हेड लाईट का ही सहारा था। मै जानना चाहती थी की आखिर टाइम कितना हो गया है, पर हाथ पर घड़ी बांधना तो मोबाइल ने छुड़वा दिया और मोबाइल उस पर्स में था जो इस वक्त गाड़ी की डिग्गी में इत्मिनान से पड़ा था. अब न इतना समय बचा था और न ही इतनी हिम्मत की गाड़ी रोककर मोबाइल निकालूं और टाइम देखूं। अभी तो बस और बस किसी तरह से फर्राटे से गाडी दौड़ाती हुई मै जल्दी से जल्दी घर पहुंचना चाहती थी कि अचानक मेरी गाडी की हेड लाईट किसी छोटी सी बच्ची के शरीर से टकरायी। वो बच्ची रौशनी की चौंध से बेअसर नि:स्तब्ध सी चली जा रही थी, पर मुझे लगा कि इस अँधेरे में मुझे इस बच्ची को अकेले नहीं छोड़ना चाहिए, एक तरफ घर पहुँचने की जल्दी दूसरी तरफ वो बच्ची....गाडी रोकूँ या चलती रहूँ...ये फैसला लेने से पहले ही मैं उस बच्ची को पार कर गयी, आगे निकल जाने पर खुद को कोसा कि मैं इतनी निष्ठुर कैसे बन गयी, एक अकेली बच्ची पर मुझे क्यूँकर तरस नहीं आया, उसे कहाँ जाना है, वो अकेली क्यूँ जा रही है, मुझे पूछना चाहिए था, पर अगले ही पल खुद को सांत्वना भी दे डाली। थोड़ी दूर आगे बढ़ी ही थी कि, फिर से वही बच्ची मेरी गाड़ी की रौशनी में मुझे आगे चलते हुए दिखाई दी। वैसी है अविचल वैसी ही नि: स्तब्ध। ऐसा कैसे हो सकता है जिस लड़की को मैंने कुछ मीटर पहले पैदल चलते देखा था, वो मुझसे आगे फिर से कैसे आ सकती है? लड़की वही है, आकर- बनावट, कपड़े -चाल सब कुछ वही है, पर ऐसा कैसे हो सकता है, ये कोई दृष्टि भ्रम भी नहीं था, क्योंकि उस लड़की को लेकर कुछ ही पल पहले मेरी खुद से गुत्थम गुत्था हुई थी। फिर आखिर ये सब क्या है? मेरा तन मन थरथराने लगा, एक तो कुहासी रात उस पर घबराहट , मुझे लगा मेरा शरीर ठण्ड से जकड़ गया है, मैंने अपनी ज़िन्दगी भर की हिम्मत को बटोरते हुए रूककर उस लड़की को ढंग से देखने का फैसला लिया। मैंने उस लड़की के पास गाड़ी रोकी और उसे रुकने के लिए कहा, उसने जैसे ही पीछे मुड़कर देखा मेरी साँसे थमी की थमी रह गयी....मारिया! मेरे मुह से सिर्फ इतना ही निकल पाया, मै जम कर जड़ हो गयी थी।
मारिया? यहाँ, वो भी इस हाल में?
कैसे? उसे तो अस्पताल में होना चाहिए था, वो तो आई सी यू में थी, फिर ये..?
मैंने डरते-डरते फिर पूछा, मारिया.....?
उसने बहुत ही उदास स्वर में कहा...मम्मा!
उस अँधेरी रात में उसका पीला चेहरा मुझे साफ़-साफ़ दिखाई दे रहा था। उसकी आवाज सुनकर मै सब कुछ भूल गयी, मैंने उसे गले लगाना चाहा पर मेरे छूने से पहले ही वो जमीन पर गिर पड़ी। मैं बहुत जोर से चिल्लाई, मारिया...........!
अपनी ही आवाज को अपने कानो में मैंने जोर से सुना और मेरी नींद खुल गयी। आह! मैंने चैन की सांस ली, शुक्र है कि ये सपना था। रजाई कम्बल एक ओर पड़े थे और मैं दूसरी ओर। मुझे जबरदस्त ठण्ड लग रही थी।
आज ही अस्पताल से लौटी अपनी प्यारी मारिया के सिर पर मैंने धीरे से हाथ फेरा और खुद को सिकोड़कर फिर से रजाई के हवाले कर दिया.

शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2012

आज की बात


जीवन में हमें संतुष्टि कभी मिलती है?
हम सभी मोह-माया के संजाल में ऐसे जकड़े हुए हैं, की उससे बाहर निकल ही नहीं पाते। एक तृप्ति पूर्ण होते ही दूसरी अभिलाषा जोर मारने लगती है। अपनी इच्छाओं के वशीभूत हम इंसान सिर्फ कठपुतली की तरह हिचकोले खाते हुए एक दिन इस दुनिया से अपनी कई अधूरी ख्वाहिशों के साथ विदा हो जाते हैं। ये इच्छाएं और हमारी विषय-कामना ये सब उस शेर की तरह हैं, जिस पर यदि हम सवार होकर उसे नियंत्रित न करें तो समय से पहले ही हमारी इहलीला की इतिश्री निश्चित है। प्रतिपल द्वेष, लालच, ईर्ष्या और क्रोधाग्नि हमारे शरीर को रोगों का घर बनाने के लिए ईंट-गारे का काम करते हैं और उस पर, जो हमारे पास है, उसके प्रति असंतुष्टि का भाव हमारे मस्तिष्क को ठोकता-पीटता रहता है, जिस कारण हम तन के साथ ही मन से भी निरोगी नहीं रह पाते और रोगी व्यक्ति दीर्घायु कैसे हो सकता है?अपनी इच्छाओं - अभिलाषाओं का दमन न कर हम खुद इनके द्वारा कुचले जाते रहते हैं और हमे इसका एहसास तब तक नहीं होता जब तक की हम स्वयं अनिष्ट को अपनी तरफ आता नही देखते...........आश्चर्य तो तब होता है जब इन सब बातों से भिज्ञ और भद्र व्यक्ति भी मौके-बे-मौके विचारोत्तेजित हो जाता है, स्वयं से नियंत्रण खो बैठता है और वही व्यवहार कर डालता है जो वांछित के प्रतिकूल हो! तो कैसे एक सामान्य व्यक्ति खुद को पूर्ण आयु के साथ सुखी जीवन जिलाए?

अपने बचपन के दिनों से ही मैंने अपने आसपास के समाज में सदा तनाव का वातावरण पाया, उसका मेरे मन-मस्तिष्क पर नकारात्मक प्रभाव रहा, किन्तु मेरे पारिवारिक माहौल ने मुझमे सामाजिकता का बीज बोया था, और उस बीज ने मेरी बढती वय के साथ - साथ थोडा-बहुत आकार ग्रहण किया जिसकी छाया से आज मै कई तरह के कष्टों की धूप से बच पाती हूँ लेकिन क्रोध-द्वेष-लालच के पंजों से मैं खुद को सदैव बचा पाऊं, इतनी गुण संपन्न मै कभी न हो सकी। किन्तु जैसा मैंने ऊपर कहा की हम तब तक नहीं चेतते जब तक अनिष्ट को अपने निकट आते नहीं देखते, इसलिए आज जब मै यह महसूस करने लगी हूँ, की मेरा शरीर मेरी आयु से अधिक बूढा हो गया है, मैने खुद को समेटने की कोशिश शुरू कर दी है. कितनी सफल हो पाउंगी यह तो मेरी दृढ़ता पर निर्भर रहेगा, किन्तु मैं समझती हूँ की अच्छे साहित्य का अध्ययन और अंतर्मनन ये दोनों ही क्रियाएं (योग जो सर्वोत्तम है, को अपने जीवन का हिस्सा बनाना मुझे कभी आ सकेगा इस पर मुझे संशय है) मेरे इस निश्चय में मेरे लिए सहायक सिद्ध होंगी.
आमीन!

सोमवार, 13 फ़रवरी 2012

रत्नों की खान का ग़ुम हो जाना..............

अक्सर ऐसा क्यूँ होता है की इंसान के चले जाने के बाद ही उसके बारे में ज्यादा जानने को मिलता है, ..............(मीडिया भी तभी सक्रिय होता है.)
 विद्या सागर नौटियाल जी के बारे में काफी कुछ सुना था, उनकी कृतियाँ-उनके साहित्य की प्रशंसा, उनका राजनैतिक योगदान, उनकी वामपंथी विचारधारा के बारे में गाहे-ब-गाहे  पढने-सुनने को मिलता रहता था, ऐसे मौकों पर उन्हें साक्षात देखने की प्रबल इच्छा होती, पर समय ने कहाँ  किसी की राह देखी  है, अब ये कभी संभव न हो सकेगा!
कल अचानक उनके चले जाने की खबर से झटका लगा, लगा की उत्तराखंड का एक और हीरा सदा के लिए खो गया मगर आज जब अखबारों में ब्लोगों में उनके बारे में इतना कुछ पढ़ा तो मालूम हुआ की एक हीरा नहीं रत्नों की खान ही खो गयी है, ऐसा ही दुःख गिर्दा के जाने पर भी महसूस हुआ था..................!! 


गुरुवार, 9 फ़रवरी 2012

'अतिक्रमण'

atikraman........
जैसे जैसे कस्बों का शहरीकरण होता जाता है, खेती की जमीनें तो ख़त्म हो ही जाती हैं, रिहायशी जमीने भी कम पड़ने लगती हैं और शुरू होने लगता है भूमाफियाओं का खेल, जिसमे छोटे-बड़े कई खिलाडी चांदी काटते हैं और फिर इन शहरों में बस्तियों के अवैध तरीकों से बसने और फिर उनके अतिक्रमण की ज़द में आने के कारन उजड़ने की एक दर्दनाक प्रक्रिया जैसे आम होने लगती हैं इस दर्द को रामदीन से बेहतर कौन समझ सकता था? आठवीं पास रामदीन उन्नीस बरस का ही था, जब एक अदद नौकरी की तलाश में शहर चला आया था, लेकिन नौकरी का पता था और ही भविष्य का, बस सभी तो पहाड़ से मैदान की ओर चले आते थे और अपने पीछे छोड़े परिवार के पास जब कभी मिलने आते तो पूरा गाँव उन्हें सिर-आंखों पे बिठाता, शायद ये ही दिखावा उसे गाँव से शहर खींच लाया था पहाड़ों में जीवन कठिन था, मगर शहर की तरह दम घोटूं नहीं, पर रामदीन को शहरी मरीचिका कदर खींच रही थी की वो शादी वाले बरस ही sअपने खेत-बैल-घर सब कुछ बेचकर कभी लौटकर आने के इरादे से सपत्नीक गाँव की दहलीज़ पार कर गया और वाकई वह कभी लौट कर नहीं पाया, चाह कर भी नहीं!..........